Rarest of rare justice verdict on police brutality – Double hanging of 9 personnel, Rs 1.40 crore compensation
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| Photo/ Source FB India/ |
मदुरै की प्रथम अतिरिक्त जिला एवं सत्र अदालत ने 6 अप्रैल 2026 को तमिलनाडु के साथानकुलम (सत्तनकुलम) पुलिस स्टेशन में 2020 के कोविड लॉकडाउन के दौरान हुई पिता-पुत्र की बर्बर हत्या के मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। जज जी मुथुकुमारन ने सभी 9 दोषी पुलिसकर्मियों को दोहरी मौत की सजा (double death sentence) सुनाई। अदालत ने इसे “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” (सबसे दुर्लभ में दुर्लभ) श्रेणी का अपराध माना और कहा कि “जहां शक्ति हो, वहां जवाबदेही भी होनी चाहिए”।
घटना का विस्तृत क्रम (19-23 जून 2020)
19 जून 2020 की शाम 7:30 बजे तूतीकोरिन जिले के साथानकुलम में मोबाइल शॉप चलाने वाले 59 वर्षीय पी. जयराज को लॉकडाउन नियम तोड़ने (दुकान 15 मिनट देर से खुली रखने) के झूठे आरोप में गिरफ्तार किया गया। इंस्पेक्टर एस. श्रीधर, सब-इंस्पेक्टर के. बालकृष्णन, पी. रघु गणेश और अन्य कांस्टेबलों ने उन्हें थाने ले जाकर बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया।
जब बेटा 31 वर्षीय जे. बेनिक्स पिता को बचाने पहुंचा तो उसे भी अंदर घसीटा गया। रात 7:45 बजे से सुबह 3 बजे तक दोनों को नंगी अवस्था में एक-दूसरे के सामने मारा गया। कपड़े उतारकर पीटा गया, खून साफ करवाया गया और “पुलिस के खिलाफ बोलने की हिम्मत कैसे हुई” की गालियां दी गईं। थाने की दीवारों और फर्श पर खून के छींटे पड़े थे, जिनका डीएनए बाद में पीड़ितों से मैच किया गया।
20 जून को दोनों को कोविलपट्टी अस्पताल ले जाया गया। वहां डॉक्टर ने रक्तस्राव के बावजूद “फिट” का सर्टिफिकेट दे दिया। मजिस्ट्रेट ने बिना जांच रिमांड कर दिया। 21 जून को दोनों को कोविलपट्टी सब-जेल भेजा गया। 22 जून रात 9 बजे बेनिक्स की आंतरिक रक्तस्राव से मौत हो गई। 23 जून सुबह 4:30 बजे जयराज की भी फेफड़ा फटने से मौत हो गई।
पोस्टमॉर्टम (तीन डॉक्टरों द्वारा, वीडियो रिकॉर्डिंग के साथ) ने यातना के स्पष्ट सबूत दिए।
हाईकोर्ट और सीबीआई ने बचाया केस
स्थानीय पुलिस ने शुरू में कवर-अप की कोशिश की, लेकिन मद्रास हाईकोर्ट (मदुरै बेंच) ने 24 जून 2020 को स्वत: संज्ञान लिया। सीबीआई को केस सौंपा गया। सीबीआई ने जुलाई 2020 में केस दर्ज किया और सितंबर 2020 में 2,427 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की। आरोप: हत्या (302), आपराधिक साजिश (120-B), गलत हिरासत (342), सबूत नष्ट करना (201) आदि।
10 पुलिसकर्मी आरोपी थे। एक (स्पेशल सब-इंस्पेक्टर पालदुरई) की कोविड से मौत हो गई। ट्रायल फरवरी 2021 से चला। 23 मार्च 2026 को सभी 9 को दोषी ठहराया गया।
दोषी पुलिसकर्मी
- इंस्पेक्टर एस. श्रीधर (मुख्य आरोपी)
- सब-इंस्पेक्टर पी. रघु गणेश
- सब-इंस्पेक्टर के. बालकृष्णन
- हेड कांस्टेबल एस. मुरुगन, ए. सामिदुरै
- कांस्टेबल एम. मुथुराज, एस. चेल्लादुरै, एक्स. थॉमस फ्रांसिस, एस. वेलुमुथु
अदालत का विश्लेषण: क्यों ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’?
जज मुथुकुमारन ने फैसले में साफ कहा:
- “पुलिस वाले, जिनका काम कानून व्यवस्था बनाए रखना था, उन्होंने खुद कानून तोड़ा। निहत्थे, बिना किसी आपराधिक इतिहास वाले पिता-पुत्र पर बदले की भावना से हमला किया।”
- “यह ‘फेंस ईटिंग द क्रॉप’ (खेत की रखवाली करने वाला ही फसल चर जाना) जैसा है।”
- “उम्रकैद भी काफी नहीं। सजा डिटरेंट बने, समाज की चेतना को छूए।”
- दोनों हत्याओं के लिए अलग-अलग फांसी – यानी दोहरी मौत की सजा।
- राज्य के एजेंट्स द्वारा मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन, साजिश, सबूत नष्ट करना और मेडिकल नेग्लिजेंस।
अदालत ने कुल 1.40 करोड़ रुपये का मुआवजा परिवार को देने का आदेश दिया। दोषियों पर कुल 1 करोड़ से ज्यादा का जुर्माना (श्रीधर पर 15 लाख सहित)।
व्यापक विश्लेषण: क्या कहता है यह फैसला?
1. पुलिस जवाबदेही का नया अध्याय: भारत में हर साल NHRC के अनुसार 100-150 से ज्यादा कस्टोडियल मौतें होती हैं, लेकिन सजा बहुत कम। यह फैसला दर्शाता है कि अगर हाईकोर्ट और सीबीआई जैसे संस्थान सक्रिय हों तो न्याय मिल सकता है। लोकल पुलिस का कवर-अप, फर्जी मेडिकल रिपोर्ट और मजिस्ट्रेट की लापरवाही – ये सिस्टमिक खामियां उजागर हुईं।
2. डिटरेंस का संदेश: जज ने स्पष्ट कहा – “ऐसा अपराध करने के बाद सोचा जाएगा कि 14 साल बाद छूट जाएंगे, लेकिन अदालत ऐसा होने नहीं देगी।” यह पुलिसकर्मियों के लिए चेतावनी है कि ‘पावर’ का दुरुपयोग बिना सजा नहीं रहेगा।
3.सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव: 2020 में JusticeForJayarajAndBennix देश-विदेश में ट्रेंड किया। प्रियंका चोपड़ा, सुरिया, करण जोहर समेत कई हस्तियों ने समर्थन किया। जॉर्ज फ्लॉयड मामले से तुलना हुई। तमिलनाडु में ‘फ्रेंड्स ऑफ पुलिस’ संगठन भंग कर दिया गया।
4. कानूनी मील का पत्थर: सुप्रीम कोर्ट के डी.के. बसु गाइडलाइंस (अरेस्ट के समय अधिकार, वीडियो रिकॉर्डिंग, CCTV) की याद दिलाता है। भविष्य में पुलिस प्रशिक्षण, इंटरोगेशन रूम में कैमरा और जवाबदेही कानून मजबूत करने की मांग बढ़ेगी।
5. सीमाएं: फैसला अब मद्रास हाईकोर्ट (मदुरै बेंच) की पुष्टि पर निर्भर। अपील होगी और प्रक्रिया लंबी खिंच सकती है। फिर भी, 6 साल बाद न्याय की यह जीत पीड़ित परिवार और समाज के लिए बड़ी राहत है।
बेनिक्स की बहन ने कहा, “2020 में जांच के नाम पर हमारे पिता और भाई की बेरहमी से हत्या हुई। 6 साल बाद न्याय मिला। यह सिर्फ हमारे परिवार के लिए नहीं, आम लोगों के लिए भी है। हम चाहते हैं कि कोई और परिवार ऐसा दर्द न झेले। अगर अपील हुई तो हम भी अंतिम सांस तक लड़ेंगे।”
यह फैसला सिर्फ 9 पुलिसकर्मियों की सजा नहीं, बल्कि पुलिस व्यवस्था में सुधार की मांग का प्रतीक है। जब राज्य के संरक्षक ही हिंसा करें तो न्याय व्यवस्था की भूमिका और भी अहम हो जाती है। साथानकुलम केस अब भारतीय न्यायिक इतिहास में कस्टोडियल क्रूरता के खिलाफ एक मिसाल के रूप में दर्ज हो गया है।

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