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शराबबंदी बिहार में सबसे बड़ा मजाक: समाज के ‘कर्णधार’ खुद शराब के गुलाम! डॉक्टर, वकील, पुलिस, लोकसेवक छुप-छुपकर पीते पकड़े गए... तो शराबबंदी कैसे??

 The biggest joke in Bihar is the prohibition of alcohol: society's "leaders" are themselves thriving under the influence of alcohol! Doctors, lawyers, police, and public servants have been caught drinking secretly... so how can alcohol be banned?

The biggest joke in Bihar is the prohibition of alcohol: society's "leaders" are themselves thriving under the influence of alcohol! Doctors, lawyers, police, and public servants have been caught drinking secretly... so how can alcohol be banned? 

लोकल पब्लिक न्यूज़/पटना, 15 मार्च 2026— कल्पना कीजिए... एक डॉक्टर, जो अस्पताल में मरीजों की जान बचाने की शपथ लेता है, रात को रिजॉर्ट में बालाओं के साथ शराब की बोतलें खोलकर पार्टी कर रहा हो। एक पुलिस अधिकारी, जिसके कंधे पर कानून की जिम्मेदारी है, थाना में या थाना के बाहर शराब की बोतलें छिपाकर पी रहा हो। एक लोक सेवक जो जनता की सेवा करने की सौगंध खाता है, सार्वजनिक कार्यक्रम में नशे में धुत पहुंचकर गिरफ्तार हो रहा हो।  

ये कोई काल्पनिक कहानी नहीं — ये बिहार की कड़वी हकीकत है। नीतीश कुमार सरकार की 2016 से चली आ रही शराबबंदी का सबसे बड़ा सच यही है कि समाज के वे कर्णधार, जिन पर हम भरोसा करते हैं, खुद इस बैन को हवा में उड़ा रहे हैं। पटना से लेकर मोतिहारी, कोटवा तक — हर जगह यही तस्वीर।  

पटना के बुद्धा रिजॉर्ट में मार्च 2025 का शर्मनाक किस्सा

पटना के जानीपुर स्थित बुद्धा रिजॉर्ट में मार्च 2025 में तीन मशहूर डॉक्टर रंगे हाथों पकड़े गए। पुलिस की छापेमारी में शराब की बोतलें, पार्टी का पूरा सामान बरामद हुआ। मेडिकल जांच हुई, नशा साबित हुआ और तीनों को जेल भेज दिया गया। ये वही डॉक्टर हैं जो गरीब मरीज को “शराब मत पीना, बीमारी बढ़ जाएगी” कहते हैं। खुद तो रिजॉर्ट में शराब उड़ा रहे थे! भला, इनकी नसीहत कोई मरीज मानेगा?  

सासाराम का सदर अस्पताल मामला

सासाराम में पटना प्रमंडल के कमिश्नर अनिमेष पराशर की पत्नी बीमार पड़ीं। सदर अस्पताल का वरिष्ठ डॉक्टर शराब पीकर इलाज करने पहुंचा। जांच का डर देखकर नशा छिपाने की कोशिश की। क्या यही है बिहार का स्वास्थ्य तंत्र?  

पुलिस महकमे की दर्दनाक स्थिति 

गया के एसएसपी कार्यालय परिसर से सील बंद शराब की बोतलें बरामद हुईं। दो सिपाही पकड़े गए। औरंगाबाद में ASI महेंद्र पासवान के घर से 6 बोतल बीयर मिलीं। मधेपुरा में ASI उत्तम कुमार मंडल का वीडियो वायरल — शराब पीते हुए। 2021 में सरकार ने आदेश दिया — शराब पीते पुलिसकर्मी को तुरंत बर्खास्त करो। लेकिन आज भी पुलिस वाले खुद बैन तोड़ रहे हैं।  

पूर्वी चंपारण और कोटवा क्षेत्र में भी यही कहानी — हालिया छापेमारी 

पूर्वी चंपारण (मोतिहारी) में शराबबंदी का उल्लंघन अब रोजमर्रा का मामला बन गया है। 1-2 मार्च 2026 को मोतिहारी शहर के प्रसिद्ध सिमरन होटल में पुलिस की बड़ी छापेमारी हुई। सदर एसडीओ अरुण कुमार और प्रशिक्षु आईपीएस हेमंत कुमार सिंह के नेतृत्व में टीम पहुंची। होटल के कमरे में शराब की बोतलें, चखना और पार्टी चल रही थी। मौके से सदर अस्पताल के प्रधान लिपिक (बड़ा बाबू), होटल संचालक और एक अन्य नामचीन होटल मालिक समेत 6 लोगों को गिरफ्तार किया गया। भारी नकदी भी बरामद हुई। ये सरकारी कर्मचारी वही हैं जो गांव-गांव जाकर “शराबबंदी का पालन करो” का भाषण देते हैं।  

कोटवा का ब्लॉक शिक्षा अधिकारी मामला 

कोटवा (पूर्वी चंपारण) में मार्च 2025 में और भी शर्मनाक घटना सामने आई। कोटवा ब्लॉक के शिक्षा अधिकारी उपेंद्र सिंह को नशे में धुत पकड़ा गया। महिला शिक्षिका की शिकायत पर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया। मेडिकल जांच में नशा साबित हुआ। ये वही अधिकारी हैं जो स्कूलों में बच्चों को “नशा मत करो” की सलाह देते हैं। आसपास के क्षेत्रों — केसरिया, चकिया, मोतिहारी — में भी पुलिस लगातार छापेमारी कर रही है, लेकिन बड़े अधिकारी और एलीट वर्ग बच जाते हैं।  

जिला स्तर पर यही दोहरा मापदंड

सुपौल में एक वरिष्ठ मत्स्य अधिकारी सार्वजनिक कार्यक्रम में नशे में धुत पहुंच गए, जहां मंत्री भी मौजूद थे। गिरफ्तार हुए।  

दिल दहला देने वाला सवालअगर कर्णधार खुद गुलाम हैं, तो आम गरीब आदमी को बैन कैसे माना जाए? 

गरीब मजदूर, किसान, दलित-महिला तो जहरीली शराब पीकर मर रहे हैं। पूरे बिहार में अब तक 190 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। हाल ही में सारण जिले में भी शराब काण्ड में 5 मौतें हुईं। पटना हाईकोर्ट ने फरवरी 2026 (18 फरवरी) में साफ कहा — “राज्य मशीनरी पूरी तरह फेल हो गई है। नागरिकों की जान खतरे में है।” अदालत ने कहा कि अवैध शराब का बाजार फल-फूल रहा है, नाबालिग तस्करी कर रहे हैं, ड्रग्स बढ़ गए हैं। लेकिन बड़े माफिया और एलीट वर्ग बच जाते हैं।   

यह बैन किसके लिए है?

क्या सिर्फ गरीबों के लिए? क्या समाज के कर्णधारों — डॉक्टर, वकील, पुलिस, शिक्षा अधिकारी — को छूट है? क्या हमारा प्रशासन, स्वास्थ्य तंत्र, पुलिस... सब शराब के नशे में डूब चुके हैं?  

पूर्वी चंपारण के कोटवा, मोतिहारी से लेकर पटना तक की तस्वीर एक जैसी है। बिहार की जनता अब चुप नहीं रह सकती। शराबबंदी एक सपना थी — महिलाओं की सुरक्षा, गरीबी मुक्ति, स्वस्थ समाज। लेकिन आज यह सपना टूट चुका है। एलीट वर्ग की यह दोहरा मापदंड हमें तोड़ रहा है। 

सरकार से सवाल है —  बैन को और सख्त बनाओ, हर स्तर पर लागू करो (चाहे वो कोई अधिकारी हो या पटना का डॉक्टर)... या फिर ईमानदारी से स्वीकार करो कि यह नीति फेल हो गई। क्योंकि जब कर्णधार ही टूट जाते हैं, तो पूरा समाज ढह जाता है।  

बिहार रो रहा है। शराबबंदी के नाम पर सिर्फ आम आदमी का खून बह रहा है। क्यूं और कब तक? 


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