Ticker

6/recent/ticker-posts

Ads

यूजीसी कानून, सामाजिक असहजता और लोकतंत्र की नई बहस

 UGC Act, Social Discomfort and the New Debate on Democracy. 

UGC Act, Social Discomfort and the New Debate on Democracy.

लोकल पब्लिक न्यूज़/ भारत में सवर्ण–अवर्ण का प्रश्न कोई नया नहीं है। यह टकराव सदियों से सामाजिक ढांचे, अधिकारों और सत्ता-संतुलन के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। समय बदला, शासन व्यवस्था बदली, लेकिन वर्चस्व और भागीदारी की यह खींचतान अलग-अलग रूपों में सामने आती रही। हाल के दिनों में केंद्र सरकार द्वारा यूजीसी कानून को अधिक सख़्त और प्रभावी बनाने की कोशिश ने इसी पुराने विमर्श को एक बार फिर सतह पर ला दिया है।



यूजीसी से जुड़े प्रस्तावित बदलावों को सरकार उच्च शिक्षा की गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही से जोड़कर देख रही है। लेकिन देश के कुछ सवर्ण तबकों में इसे लेकर असंतोष इसलिए उभरा, क्योंकि उन्हें आशंका है कि इन बदलावों से परंपरागत प्रभाव, नियुक्तियों और निर्णय-प्रक्रिया में उनकी भूमिका सीमित हो सकती है। यानी असल चिंता शिक्षा से ज़्यादा सत्ता और नियंत्रण की है।

इतिहास गवाह है कि अधिकार और सत्ता को बनाए रखने के लिए संघर्ष हर युग में हुआ है। राजतंत्र में यह संघर्ष तलवार और षड्यंत्रों से लड़ा जाता था, तो लोकतंत्र में यह बहस, आंदोलन और कानूनों के ज़रिये लड़ा जाता है। फर्क बस इतना है कि अब लड़ाई खुली है और जनता के सामने है।

लोकतंत्र लागू करते समय यह मान लिया गया था कि बहुमत का सिद्धांत सभी को बराबरी का अवसर देगा—सत्य और असत्य, अच्छा और बुरा, सबको एक वोट के तराज़ू पर तौल दिया गया। यह सोच आदर्शवादी थी, लेकिन व्यवहार में सत्ता-संतुलन हमेशा समान नहीं रहा।

शुरुआत में यह भी समझा गया कि बड़े पैमाने पर मतदाताओं को प्रभावित करना संभव नहीं होगा। लेकिन समय ने साबित किया कि सूचना, संसाधन और सामाजिक संरचनाओं के ज़रिये जनमत को प्रभावित किया जा सकता है। यही वजह है कि लोकतंत्र में भी असमानताएं बनी रहीं और वंचित वर्गों को बराबरी के लिए बार-बार संघर्ष करना पड़ा।

यूजीसी कानून को लेकर उठी यह बहस दरअसल शिक्षा से आगे जाकर सामाजिक शांति और समावेशन के प्रश्न तक पहुंच जाती है। सवाल यह नहीं है कि कौन वर्ग नाराज़ है, बल्कि यह है कि क्या हमारी नीतियां सभी को समान अवसर देने में सक्षम हैं।

शायद अब समय आ गया है कि टकराव की राजनीति से आगे बढ़कर संवाद, पारदर्शिता और भरोसे पर आधारित नए रास्ते खोजे जाएं—ताकि सुधारों को किसी वर्ग के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि समाज के हित में देखा जा सके।

यूजीसी कानून पर मचा शोर यह बताता है कि भारत का लोकतंत्र जीवित है, सवाल पूछ रहा है। लेकिन अगर हर सुधार को सत्ता-छिनने के डर से देखा जाएगा, तो शांति और प्रगति दोनों बाधित होंगी। जरूरत है संतुलित सोच की—जहां अधिकार भी हों, जवाबदेही भी; बराबरी भी हो और गुणवत्ता भी। तभी सदियों पुरानी यह लड़ाई किसी सार्थक निष्कर्ष तक पहुंच पाएगी। 

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ